जैसे-जैसे गर्मी और उमस का मौसम दस्तक देता है, मच्छरों का आतंक भी बढ़ने लगता है। खुद को और परिवार को डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों से बचाने के लिए हम अक्सर बाजार में मिलने वाली मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियाँ या क्वाइल जलाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस धुएं को आप मच्छरों का ‘काल’ समझते हैं, वह असल में आपके परिवार के लिए ‘धीमा जहर’ साबित हो रहा है?
डॉक्टरों और शोधकर्ताओं की मानें तो बंद कमरे में एक मच्छर वाली अगरबत्ती जलाना लगभग 100 सिगरेट पीने जितना खतरनाक हो सकता है। यह सुनकर शायद आपको यकीन न हो, लेकिन इसका धुआं फेफड़ों की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।
फेफड़ों पर होता है ‘अदृश्य’ हमला
इन अगरबत्तियों में ‘पाइरेथ्रिन’ और ‘एलेथ्रिन’ जैसे खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल होता है। जब ये जलते हैं, तो इनसे निकलने वाले बारीक कण सीधे हमारे फेफड़ों की गहराई तक पहुँच जाते हैं।
अक्सर लोग सुबह उठने पर गले में हल्की खराश, खांसी या भारीपन महसूस करते हैं। हम इसे मामूली जुकाम या बदलते मौसम का असर समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि यह असल में धुएं के कारण फेफड़ों में आई सूजन का शुरुआती संकेत होता है। अगर यह आदत लंबे समय तक बनी रहे, तो यह दमा (अस्थमा) जैसी गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है।
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सिर्फ सांस नहीं, आंखों और दिमाग पर भी असर
खतरा सिर्फ फेफड़ों तक ही सीमित नहीं है। रात भर बंद कमरे में इस धुएं के बीच सोने से वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा काफी बढ़ जाती है। यह गैस हमारे रक्त में ऑक्सीजन के प्रवाह को बाधित करती है।
यही कारण है कि इस धुएं के संपर्क में रहने वाले लोगों को अक्सर सुबह उठने पर भयंकर सिरदर्द या एक अजीब सी मानसिक थकान महसूस होती है। इसके अलावा, जब यह जहरीली गैस आंखों के संपर्क में आती है, तो यह आंखों की नाजुक झिल्ली को नुकसान पहुँचाती है, जिससे आंखों में लगातार लालपन और खुजली की समस्या होने लगती है।
क्या है सुरक्षित विकल्प?
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों का मानना है कि मच्छरों से बचने के लिए रसायनों के बजाय प्राकृतिक तरीकों को अपनाना ही बुद्धिमानी है। घरों में नीम के तेल का दीया जलाना या कपूर का इस्तेमाल करना सबसे सुरक्षित विकल्प माना गया है।
इसके अलावा, खिड़कियों पर जाली लगवाना और सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करना सबसे बेहतरीन तरीका है। इसमें किसी भी तरह के जानलेवा धुएं का जोखिम नहीं होता।





