दुनिया में विलासिता (Luxury) का दूसरा नाम Rolls-Royce है। इस कार के बारे में कहा जाता है कि कंपनी एक छोटी सी सुई से लेकर कार के पेंट तक, हर चीज़ में ‘परफेक्शन’ तलाशती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस सीट पर बैठकर आप शाही अहसास करते हैं, उसे बनाने के पीछे कितनी अजीब और चौंकाने वाली मेहनत छिपी है?
अक्सर लग्जरी कारों में लेदर (चमड़े) का इस्तेमाल होता है, लेकिन रोल्स-रॉयस के लिए इस्तेमाल होने वाला लेदर दुनिया में सबसे अलग है। कंपनी अपनी सीटों के लिए केवल खास बैलों की चमड़ी का ही इस्तेमाल करती है।
आइए, इस लेख में जानते हैं इसके पीछे की वो हैरान कर देने वाली वजहें।
गाय नहीं, सिर्फ ‘बैल’ की चमड़ी का चुनाव
रोल्स-रॉयस अपनी कारों के लिए गाय की खाल का इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि केवल ‘सांड या बैल’ (Bulls) की खाल चुनती है। इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है। मादा गायों की खाल पर गर्भावस्था के दौरान खिंचाव के निशान (Stretch Marks) आ जाते हैं, जिससे लेदर की फिनिशिंग में अंतर आ जाता है। कंपनी चाहती है कि लेदर का हर इंच एक जैसा और चिकना हो, इसलिए वे केवल बैलों को ही प्राथमिकता देते हैं।
समुद्र तल से हजारों फीट ऊपर का राज
बैलों का चुनाव ही काफी नहीं है, कंपनी यह भी देखती है कि वे बैल कहाँ पले-बढ़े हैं। रोल्स-रॉयस केवल उन बैलों की खाल लेती है जो स्कैंडिनेवियाई देशों (जैसे नॉर्वे, स्वीडन) के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में रहते हैं।
ये भी पढ़ें: Rolls-Royce की पेंट जॉब में लगते हैं 6 महीने! जानें हाथ से बनी इस कार की बारीकियां जो इसे बनाती हैं बेशकीमती
इसका कारण यह है कि पहाड़ी इलाकों में ठंड बहुत होती है, जिससे वहाँ मच्छर और दूसरे कीड़े-मकोड़े नहीं पनपते। मैदानी इलाकों में रहने वाले जानवरों को मच्छर काटते हैं, जिससे उनकी खाल पर छोटे-छोटे दाग या निशान पड़ जाते हैं। कंपनी को ‘दाग-रहित’ (Zero Mark) लेदर चाहिए होता है, जो केवल इन ठंडे पहाड़ों पर ही मुमकिन है।
कटीली झाड़ियों से दूर रहने वाले जानवर
रोल्स-रॉयस यह भी सुनिश्चित करती है कि जिन बैलों का इस्तेमाल हो रहा है, वे ऐसे खेतों में न चरें जहाँ कटीली तारें (Barbed Wire) लगी हों। अगर चरते समय जानवर के शरीर पर एक मामूली सी खरोंच भी आ जाए, तो कंपनी उस पूरी खाल को रिजेक्ट कर देती है। परफेक्शन की इस हद की वजह से ही कार की सीटें दशकों तक नई जैसी चमकती रहती हैं।
रंगने की अनोखी तकनीक (Vat Dyeing)
आमतौर पर लेदर को ऊपर से स्प्रे करके पेंट किया जाता है, लेकिन रोल्स-रॉयस ऐसा नहीं करती। वे ‘वैट डाइंग’ (Vat Dyeing) तकनीक का उपयोग करते हैं, जिसमें चमड़े को बड़े ड्रमों में रंग के साथ डुबोया जाता है। इससे रंग चमड़े के अंदर तक चला जाता है। इसका फायदा यह है कि भविष्य में अगर सीट पर कोई हल्की खरोंच भी आए, तो अंदर से असली रंग ही निकलता है, कोई सफेद निशान नहीं पड़ता।
एक कार के लिए 18 जानवरों की खाल
आपको जानकर हैरानी होगी कि केवल एक Rolls-Royce Phantom को तैयार करने के लिए लगभग 15 से 18 बैलों की खाल का इस्तेमाल किया जाता है। इन खालों को चुनने के बाद, कंपनी के विशेषज्ञ घंटों तक इनका निरीक्षण करते हैं। लेदर की सिलाई भी हाथों से की जाती है और इसमें इस्तेमाल होने वाला धागा भी बेहद मजबूत और खास होता है।
ये भी पढ़ें: Rolls-Royce Phantom: आखिर क्यों इसे दुनिया की ‘सर्वश्रेष्ठ कार’ कहा जाता है? जानें इसके राजसी फीचर्स की पूरी लिस्ट
पसीने और तापमान का खास ध्यान
रोल्स-रॉयस का लेदर इस तरह तैयार किया जाता है कि वह गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में आरामदायक रहे। यह लेदर कभी भी ‘चिपचिपा’ नहीं होता, चाहे आप कितनी भी लंबी यात्रा क्यों न करें। यही वह बारीकियाँ हैं जो इसे दुनिया की सबसे आरामदायक सवारी बनाती हैं।
निष्कर्ष: यह सिर्फ सीट नहीं, एक विरासत है
रोल्स-रॉयस की सीटों के पीछे छिपी यह कहानी बताती है कि क्यों यह कार करोड़ों की आती है। यहाँ केवल पैसा नहीं, बल्कि उस ‘परफेक्शन’ की कीमत ली जाती है जिसे हासिल करने के लिए प्रकृति और इंसानी हुनर का अद्भुत संगम होता है। जब आप रोल्स-रॉयस में बैठते हैं, तो आप प्रकृति के सबसे शुद्ध और बेहतरीन लेदर का अनुभव कर रहे होते हैं।
फोटो क्रेडिट: @rollsroycecars (Official Instagram Account)





