दुनिया में ऐसी कई कारें हैं जो अपनी रफ़्तार के लिए जानी जाती हैं, और कुछ ऐसी हैं जो अपनी तकनीक के लिए। लेकिन जब बात Rolls-Royce की आती है, तो यहाँ मुकाबला रफ़्तार से नहीं, बल्कि ‘परफेक्शन’ से होता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक कार को केवल पेंट करने में 6 महीने का समय लग सकता है?
जितने समय में एक साधारण कंपनी हजारों कारें बनाकर बेच देती है, उतने समय में रोल्स-रॉयस के कारीगर केवल एक कार की फिनिशिंग पर काम करते हैं। आज Sochvimarsh के इस विशेष लेख में हम जानेंगे कि आखिर इस कार के पेंट और मेकिंग प्रोसेस में ऐसा क्या है, जो इसे दुनिया की सबसे महंगी और बेशकीमती सवारी बनाता है।
मशीनों का नहीं, इंसानी हाथों का जादू
आज के दौर में जहाँ हर बड़ी कार कंपनी रोबोट्स का इस्तेमाल करती है, वहीं रोल्स-रॉयस आज भी अपने ‘हैंडमेड’ (हाथ से बनी) होने पर गर्व करती है। कंपनी का मानना है कि जो बारीकी एक इंसान की आँख और हाथ दे सकते हैं, वह कोई मशीन कभी नहीं दे सकती।
कार की बॉडी तैयार होने से लेकर उसके इंटीरियर की सिलाई तक, हर चीज़ बेहद अनुभवी कारीगरों द्वारा की जाती है। यही कारण है कि एक रोल्स-रॉयस को तैयार होने में कम से कम 6 महीने का समय लगता है, जो कस्टमाइजेशन के आधार पर और भी बढ़ सकता है।
पेंट की 5 परतें और 45 किलो वजन
रोल्स-रॉयस की सबसे बड़ी खासियत इसका पेंट जॉब है। कंपनी ग्राहक को 44,000 से भी ज़्यादा रंगों के विकल्प देती है। अगर आपको इनमें से भी कोई पसंद न आए, तो कंपनी आपके बताए हुए किसी भी शेड (जैसे आपकी पसंदीदा लिपस्टिक या पालतू जानवर की आँखों का रंग) को हूबहू तैयार कर सकती है।
पेंटिंग की प्रक्रिया में कम से कम पांच परतें (Layers) लगाई जाती हैं। सबसे पहले प्राइमर, फिर बेस कोट, उसके बाद रंग की दो परतें और अंत में एक हाई-ग्लोस क्लियर कोट। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 45 किलो पेंट का इस्तेमाल किया जाता है। हर परत के बाद कार को हाथों से पॉलिश किया जाता है ताकि दर्पण (Mirror) जैसी चमक मिल सके।
‘कोचलाइन’ का रहस्य: दुनिया में सिर्फ एक ही व्यक्ति!
इस कार की सबसे अद्भुत बात इसकी ‘कोचलाइन’ है। यह कार की बॉडी पर आगे से पीछे तक जाने वाली एक बहुत ही बारीक सीधी रेखा होती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरी दुनिया में रोल्स-रॉयस के पास केवल एक ही व्यक्ति (मार्क कोर्ट) है जो इस रेखा को पेंट करता है।
मार्क कोर्ट इस रेखा को खींचने के लिए गिलहरी के बालों से बने विशेष ब्रश का इस्तेमाल करते हैं। इस काम में कोई मशीन या टेप इस्तेमाल नहीं होता। अगर मार्क का हाथ एक मिलीमीटर भी हिल जाए, तो पूरी कार को दोबारा पेंट करना पड़ता है। मार्क के पास इस काम के लिए कोई बैकअप नहीं है; वह जब छुट्टी पर होते हैं, तो यह काम रुक जाता है।
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लेदर और लकड़ी का शाही इस्तेमाल
कार के अंदर का हिस्सा किसी महल से कम नहीं होता। एक कार के इंटीरियर के लिए लगभग 15 से 18 बैलों की खाल का इस्तेमाल किया जाता है। कंपनी केवल उन बैलों का चमड़ा चुनती है जो ठंडे प्रदेशों (जैसे स्कैंडिनेविया) में रहते हैं, क्योंकि वहाँ मच्छरों के काटने के निशान चमड़े पर नहीं होते।
वहीं, डैशबोर्ड के लिए इस्तेमाल होने वाली लकड़ी दुनिया के सबसे दुर्लभ पेड़ों से आती है। लकड़ी के पैटर्न को इस तरह मिलाया जाता है कि वह एक मिरर इमेज जैसा दिखे। इसे ‘बैलेंसिंग’ कहा जाता है, जिसमें हफ़्तों का समय लगता है।
शांति की कोई कीमत नहीं
पेंट और इंटीरियर के बाद बारी आती है ‘साउंडप्रूफिंग’ की। रोल्स-रॉयस अपनी कारों में 130 किलो से ज़्यादा साउंड इंसुलेशन मटीरियल भरती है। कंपनी ने टायरों के अंदर भी विशेष फोम डलवाया है ताकि सड़क की आवाज़ अंदर न आए।
कहा जाता है कि जब यह कार सड़कों पर चलती है, तो केबिन के अंदर इतनी शांति होती है कि आपको अपनी घड़ी की टिक-टिक भी साफ सुनाई देगी। इस लेवल की फिनिशिंग हासिल करने में महीनों की टेस्टिंग और मेहनत लगती है।
निष्कर्ष: यह कार नहीं, एक निवेश है
रोल्स-रॉयस की ऊंची कीमत का कारण केवल ब्रांड का नाम नहीं है, बल्कि वह 6 महीने की कड़ी मेहनत और बारीकियां हैं जो हर कार को दूसरी से अलग बनाती हैं। जब आप एक रोल्स-रॉयस खरीदते हैं, तो आप केवल एक वाहन नहीं, बल्कि इंसानी हुनर का एक ऐसा नमूना खरीदते हैं जो सदियों तक चलता है।
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यही वह कारण है कि 100 साल पहले बनी रोल्स-रॉयस कारें आज भी सड़कों पर उतनी ही शान से दौड़ रही हैं। यह परफेक्शन ही इस ब्रांड को दुनिया का निर्विवाद राजा बनाता है।
फोटो क्रेडिट: @rollsroycecars (Official Instagram Account)





