कंबोडिया, जिसे हिंदू संस्कृति और भव्य मंदिरों की जननी माना जाता है, वहां से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया के सनातनी और इतिहास प्रेमियों का दिल तोड़ दिया है। कंबोडिया के सिएम रीप इलाके के पास भगवान विष्णु की एक अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ प्रतिमा को बुरी तरह खंडित कर दिया गया है।
यह केवल एक पत्थर की मूर्ति का टूटना नहीं है, बल्कि एक जीवित इतिहास और हज़ारों साल पुरानी आस्था पर किया गया गहरा प्रहार है। इस ब्लॉग में हम इस घटना की जड़ तक जाएंगे और जानेंगे कि आखिर क्यों और कैसे इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया।
घटना का काला सच: क्या हुआ उस दिन?
सिएम रीप प्रांत के बाहरी इलाके में स्थित एक प्राचीन खुदाई स्थल पर, जहाँ भगवान विष्णु की ‘अनंत शयन’ मुद्रा (क्षीर सागर में लेटे हुए) वाली एक विशाल प्रतिमा मिली थी, वहां अज्ञात हमलावरों ने धावा बोला। हमलावरों ने मूर्ति के मुख्य अंगों, जैसे हाथ और गदा को हथौड़ों और भारी औजारों से तोड़ दिया। स्थानीय ग्रामीणों ने जब सुबह यह मंजर देखा, तो वहां मातम छा गया।
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आखिर क्यों किया गया ऐसा? (असली वजह)
इस तोड़फोड़ के पीछे दो मुख्य कारण सामने आ रहे हैं जो कंबोडिया में एक कैंसर की तरह फैल रहे हैं:
- कला तस्करी का काला बाज़ार: कंबोडिया की प्राचीन मूर्तियाँ अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में करोड़ों रुपये में बिकती हैं। तस्कर (smugglers) अक्सर मूर्तियों को छोटा करने के लिए उन्हें तोड़ देते हैं ताकि वे आसानी से देश के बाहर ले जा सकें। इस बार भी मूर्ति का एक विशेष हिस्सा (जो संभवतः बहुमूल्य धातु या रत्न जड़ित था) गायब पाया गया है।
- खजाने का अंधविश्वास: कंबोडिया के कुछ इलाकों में यह अंधविश्वास फैला हुआ है कि इन मूर्तियों के भीतर प्राचीन राजाओं ने सोना और हीरे छुपाए हैं। इसी ‘खजाने’ की चाहत में लोग हज़ारों साल पुरानी कलाकृतियों को बेरहमी से तोड़ देते हैं।
कंबोडिया और भारत का अटूट संबंध
कंबोडिया का इतिहास भगवान विष्णु के बिना अधूरा है। 12वीं शताब्दी में बना अंकोरवाट मंदिर इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जब कंबोडिया में किसी मूर्ति पर आंच आती है, तो उसकी गूँज भारत में इसलिए सुनाई देती है क्योंकि ये हमारी साझा विरासत है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) दशकों से यहाँ के मंदिरों को बचाने में लगा है, लेकिन ऐसी घटनाएं उस मेहनत पर पानी फेर देती हैं।
मूर्ति का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
जिस प्रतिमा को नुकसान पहुँचाया गया है, वह ‘मेबोन’ काल की मानी जा रही है। ऐसी मूर्तियाँ आज के समय में मिलना लगभग असंभव है। यह विष्णु के उस रूप को दर्शाती थी जहाँ वे सृष्टि के निर्माण की मुद्रा में थे। इसका खंडित होना पुरातत्व विज्ञान के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।
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कंबोडियाई अधिकारियों की ढिलाई?
स्थानीय लोगों में प्रशासन के प्रति भारी रोष है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब इस इलाके में प्राचीन अवशेष मिलने की पुष्टि हो चुकी थी, तो वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम क्यों नहीं थे? कंबोडियाई सरकार ने अब जाकर जांच के आदेश दिए हैं और दोषियों पर भारी जुर्माना और उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी है।
क्या कहता है विश्व समुदाय?
यूनेस्को (UNESCO) और अन्य अंतरराष्ट्रीय धरोहर संरक्षण संस्थाओं ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कंबोडिया अपनी इन संपत्तियों को नहीं बचा पाया, तो आने वाली पीढ़ियों के पास देखने के लिए सिर्फ पत्थर के टुकड़े बचेंगे।
भारत की प्रतिक्रिया: क्या हस्तक्षेप ज़रूरी है?
भारत सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। सूत्रों के मुताबिक, कंबोडिया स्थित भारतीय दूतावास ने वहां के सांस्कृतिक मंत्रालय से रिपोर्ट मांगी है। भारत इस प्रतिमा के जीर्णोद्धार (Restoration) के लिए अपनी विशेष टीम भेजने की पेशकश भी कर सकता है।
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निष्कर्ष: अब आगे क्या?
कंबोडिया में विष्णु प्रतिमा के साथ हुई यह बर्बरता हमें चेतावनी देती है कि हमारी विरासत सुरक्षित नहीं है। हमें केवल सोशल मीडिया पर गुस्सा ज़ाहिर करने के बजाय ऐसी संस्थाओं का समर्थन करना होगा जो ज़मीनी स्तर पर इन धरोहरों की रक्षा कर रही हैं। दोषियों को सजा मिलना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है इन अनमोल रत्नों की चौबीसों घंटे सुरक्षा सुनिश्चित करना।
नोट: इस लेख में उपयोग की गई फीचर इमेज सोशल मीडिया से ली गई है। इसका श्रेय मूल पोस्ट करने वाले को जाता है।





