आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में स्क्रीन टाइम जरूरत से ज्यादा बढ़ चुका है। सुबह उठते ही फोन देखना, दिनभर सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना, ऑफिस में लैपटॉप पर काम करना और रात में मोबाइल लेकर सो जाना हमारे रोजमर्रा का हिस्सा बन गया है। कई लोग तो यह भी महसूस नहीं करते कि वे दिन में कितने घंटे स्क्रीन पर नजरें टिकाए रहते हैं। धीरे-धीरे यह आदत हमारी मानसिक सेहत, नींद और दिमाग की कार्यक्षमता पर गहरा असर डालने लगती है। खासकर 30+ उम्र के लोग, महिलाएं, छात्र और वर्किंग प्रोफेशनल्स सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि वे काम, मनोरंजन और सोशल कनेक्टिविटी — तीनों के लिए स्क्रीन पर निर्भर होते जा रहे हैं। लगातार स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट और दिमाग पर डाले गए लगातार विजुअल लोड से शरीर के प्राकृतिक हार्मोन, नींद का चक्र और मस्तिष्क की क्षमता सब प्रभावित होते हैं।
आज दुनिया भर में शोध बता रहे हैं कि लगातार स्क्रीन पर नजरें टिकाए रखने से दिमाग कभी पूरी तरह आराम नहीं कर पाता। ब्रेन लगातार एक्टिव मोड पर रहता है, जिससे मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, भूलने की आदत, गुस्सा और थकान जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं। शरीर भले थक जाए, लेकिन दिमाग हमेशा किसी न किसी इनपुट का इंतजार करता रहता है। यही वजह है कि लोग आराम करने या सोने के समय भी फोन बार-बार चेक करते हैं और खुद को शांत नहीं कर पाते। धीरे-धीरे यह पैटर्न नींद की गुणवत्ता को कमजोर कर देता है और व्यक्ति सुबह उठकर तरोताजा महसूस नहीं कर पाता।
ब्लू लाइट दिमाग पर क्या असर डालती है?
जब आप मोबाइल, टीवी या लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं, तो उनसे निकलने वाली ब्लू लाइट सीधे आपकी आंखों और दिमाग पर असर डालती है। यह लाइट आपके दिमाग के ‘मेलाटोनिन’ नाम के हार्मोन को दबा देती है। मेलाटोनिन वही हार्मोन है जो शरीर को बताता है कि अब सोने का समय है। लेकिन अगर रात में सोने से पहले आप ज्यादा स्क्रीन देख लेते हैं, तो दिमाग समझ ही नहीं पाता कि उसे अब रिलैक्स होना है। परिणाम यह होता है कि नींद देर से आती है, बार-बार टूटती है और सुबह उठने पर शरीर भारी महसूस होता है।
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ब्लू लाइट केवल नींद को प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह आंखों की मांसपेशियों को भी लगातार काम करने पर मजबूर कर देती है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, जलन, सिरदर्द, और आंखों का धुंधला होना बहुत आम समस्याएँ बन चुकी हैं। शोध बताते हैं कि दिनभर में तीन घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम आंखों के तनाव को लगभग 60% बढ़ा देता है।
दिमाग की एकाग्रता पर असर — क्यों बढ़ रहा है ‘डिजिटल ब्रेन फॉग’?
आजकल लोग अक्सर महसूस करते हैं कि वे पहले की तरह फोकस नहीं कर पाते। पढ़ाई या काम करते समय ध्यान भटक जाता है, बातें बार-बार भूलने लगते हैं, या किसी एक चीज़ पर लंबे समय तक फोकस करना मुश्किल हो जाता है। इसे “डिजिटल ब्रेन फॉग” कहा जाता है। लगातार स्क्रीन देखने से दिमाग को बहुत तेज़ी से सूचनाएँ मिलती रहती हैं — कभी रील्स, कभी वीडियो, कभी मैसेज, कभी नोटिफिकेशन। यह ओवरलोड दिमाग की प्रोसेसिंग क्षमता को कमजोर कर देता है और दिमाग छोटी-छोटी चीज़ें भी जल्दी भूलने लगता है।
सोशल मीडिया का “फास्ट कंटेंट” दिमाग को तेजी से बदलने की आदत डाल देता है। इससे दिमाग किसी एक काम में गहराई तक नहीं जा पाता और व्यक्ति की कार्यक्षमता घटने लगती है। यही कारण है कि बच्चों में पढ़ाई पर फोकस की समस्या और बड़ों में निर्णय लेने की क्षमता घटने जैसे मुद्दे तेजी से बढ़ रहे हैं।
स्क्रीन टाइम नींद को कैसे खराब करता है?
नींद एक ऐसी प्रक्रिया है जो शरीर और दिमाग दोनों को रीसेट करती है। लेकिन अगर सोने से पहले फोन, टीवी या लैपटॉप का इस्तेमाल किया जाए तो दिमाग ‘अलर्ट मोड’ में बना रहता है। इससे न सिर्फ नींद देर से आती है, बल्कि नींद की गहराई भी कम हो जाती है। कई लोग महसूस करते हैं कि वे 7–8 घंटे सोने के बाद भी तरोताजा महसूस नहीं करते — इसका कारण होती है खराब नींद की गुणवत्ता।
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रात में फोन की लत इतनी बढ़ चुकी है कि लोग बिस्तर पर लेटकर भी सोचते हैं कि एक वीडियो और देख लूं या एक बार WhatsApp चेक कर लूं। यह आदत दिमाग को शांत होने का मौका ही नहीं देती। यही वजह है कि आजकल युवा और महिलाएँ सबसे ज्यादा “स्लीप डेप्रिवेशन” का शिकार हो रहे हैं।
मानसिक तनाव और चिंता क्यों बढ़ रही है?
लगातार स्क्रीन पर बने रहने से दिमाग को आराम नहीं मिलता। सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी देखकर तुलना बढ़ती है, जिससे तनाव, चिंता और आत्मविश्वास कम होने लगता है। नकारात्मक खबरें, हिंसक वीडियो और तेज़ रोशनी दिमाग को उत्तेजित कर देती हैं। यह उत्तेजना रात तक बनी रहती है और व्यक्ति खुद को शांत नहीं कर पाता।
इसके अलावा नोटिफिकेशन का डर — यानी FOMO (Fear of Missing Out) — भी तनाव बढ़ाता है। लोग लगता है कि अगर उन्होंने फोन नहीं देखा तो कोई जरूरी चीज़ मिस हो जाएगी। धीरे-धीरे यह आदत मानसिक बेचैनी, गुस्सा और चिड़चिड़ापन पैदा करती है।
शरीर पर भी असर — गर्दन, पीठ और नींद का चक्र बिगड़ना
बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम का असर केवल दिमाग पर नहीं, शरीर पर भी दिखता है। घंटों मोबाइल झुककर देखने से गर्दन में दर्द, कंधों का तनाव और पीठ में अकड़न आम हो चुका है। इसे ‘टेक नेक’ कहा जाता है। इसके अलावा लैपटॉप पर लंबे समय तक बैठने से कमर में दर्द और शरीर का पोस्चर खराब होने लगता है।
एक और बड़ा खतरा यह है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम आपके स्लीप साइकिल को बिगाड़ देता है, जिससे वजन बढ़ना, हार्मोनल असंतुलन, त्वचा समस्याएँ और भूख बढ़ना जैसी परेशानियाँ दिखने लगती हैं।
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स्क्रीन टाइम कैसे कम करें? आसान उपाय जो सच में काम करते हैं
स्क्रीन टाइम को अचानक कम करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन कुछ आदतें बदलकर इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। सबसे पहले, सोने से एक घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद कर दें। यह आदत अकेले ही आपकी नींद की गुणवत्ता को 40% तक बेहतर कर सकती है। मोबाइल में ब्लू लाइट फिल्टर ऑन करें, खासकर शाम के बाद। काम के बीच 20 मिनट का ब्रेक लें और 20 सेकंड के लिए दूर किसी चीज़ को देखें — इससे आंखों को राहत मिलती है।
नोटिफिकेशन बंद करना भी एक बेहद प्रभावी तरीका है। जब फोन बार-बार नहीं बजेगा, तो दिमाग भी ज्यादा शांत रहेगा। सोशल मीडिया को सीमित समय पर चेक करें और एक साथ कई स्क्रीन (जैसे टीवी + फोन) का इस्तेमाल न करें। घर में खाने के समय, परिवार के साथ बैठते समय और रात को सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाएँ।
डिजिटल दुनिया से भागा नहीं जा सकता, लेकिन हम यह तो कर सकते हैं कि स्क्रीन का इस्तेमाल समझदारी से करें। दिमाग को आराम देना, नींद ठीक करना और आंखों को सुरक्षा देना हमारी जिम्मेदारी है। जब स्क्रीन टाइम कम होता है, तो दिमाग साफ चलता है, याददाश्त बढ़ती है, मूड अच्छा रहता है और शरीर भी हल्का महसूस होता है।





