पिछले कुछ सालों से टेक की दुनिया में एक खामोश जंग चल रही थी। यह जंग किसी सीमा को लेकर नहीं, बल्कि ‘Apple’ के साम्राज्य को अपने देश में बसाने को लेकर थी। एक तरफ छोटा लेकिन बेहद फुर्तीला वियतनाम था, और दूसरी तरफ विशाल संसाधनों वाला भारत।
लेकिन 2026 की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रम्प की भारत के साथ हुई ऐतिहासिक ‘18% टैरिफ डील’ ने इस जंग का रुख पूरी तरह मोड़ दिया है। ट्रम्प ने एक तरह से यह साफ़ कर दिया है कि अमेरिका की नज़रों में चीन का असली विकल्प वियतनाम नहीं, बल्कि भारत है।
वियतनाम की बढ़ती टेंशन और भारत का मास्टरस्ट्रोक
वियतनाम अब तक Apple के लिए पसंदीदा जगह था क्योंकि वहां की सरकार ने शुरू से ही इलेक्ट्रॉनिक्स पर टैक्स कम रखे थे। लेकिन वियतनाम की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी ‘चीन पर निर्भरता’ बन गई। वियतनाम में बनने वाले ज़्यादातर पार्ट्स अभी भी चीन से आते हैं, जिसे ट्रम्प प्रशासन पसंद नहीं करता।
दूसरी ओर, भारत ने अपनी ‘PLI स्कीम’ और अब ट्रम्प के साथ हुई नई डील के जरिए अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। ट्रम्प की 18% टैरिफ छूट का मतलब है कि भारत में बना iPhone अब अमेरिकी बाज़ार में वियतनाम के फोन से सस्ता होगा।
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क्यों ट्रम्प ने वियतनाम के बजाय भारत को चुना?
ट्रम्प हमेशा से ‘बड़े बाज़ार’ और ‘बड़े समझौतों’ के शौकीन रहे हैं। वियतनाम एक छोटा देश है जो अमेरिका को बदले में बहुत कुछ नहीं दे सकता। इसके विपरीत, भारत ने अमेरिका को 500 बिलियन डॉलर के व्यापार का भरोसा दिया है, जिससे ट्रम्प का ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडा भी पूरा होता है।
इसके अलावा, भारत में टाटा (Tata) जैसे बड़े समूह अब खुद iPhone मैन्युफैक्चरिंग में उतर चुके हैं। ट्रम्प को भरोसा है कि भारत केवल फोन ‘असेम्बल’ नहीं करेगा, बल्कि आने वाले समय में इसके कलपुर्जे (Components) भी खुद बनाएगा, जिससे चीन का पत्ता पूरी तरह साफ़ हो जाएगा।
सस्ती लेबर और विशाल बाज़ार का असली गणित
वियतनाम में लेबर की कमी होने लगी है, जबकि भारत के पास युवाओं की एक विशाल फौज है। Apple जैसी कंपनियां देख रही हैं कि भारत में न केवल फोन बनाना सस्ता है, बल्कि यहाँ फोन खरीदने वाले लोग भी करोड़ों में हैं।
भारत की इस दोहरी ताकत ने ही उसे वियतनाम से आगे निकाल दिया है। जानकारों का कहना है कि अगले दो सालों में वियतनाम को पीछे छोड़ते हुए दुनिया के 35% से ज्यादा iPhone भारत में बन सकते हैं। यह वियतनाम के लिए एक बड़ा झटका है, जो सालों से इस कुर्सी का इंतज़ार कर रहा था।
क्या भारत वाकई बन पाएगा ‘एप्पल का किंग’?
चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। वियतनाम हार मानने को तैयार नहीं है और वह भी अपनी टैरिफ नीतियां बदल रहा है। लेकिन फिलहाल के लिए, ट्रम्प-मोदी की केमिस्ट्री ने भारत को इस रेस में कोसों आगे खड़ा कर दिया है।
अगर भारत अपनी लॉजिस्टिक कमियों को दूर कर लेता है, तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया के हर कोने में ‘मेड इन इंडिया’ iPhone होगा।
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