भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि एक भावना बन जाती हैं। साल 1997 में आई ‘बॉर्डर’ उन्हीं में से एक थी जिसने हर हिंदुस्तानी के दिल में देशभक्ति की लहर पैदा कर दी थी। अब करीब 29 साल के लंबे इंतजार के बाद सनी देओल एक बार फिर ‘बॉर्डर 2’ के साथ वापस लौटे हैं।
इस बार फिल्म का कैनवास पहले से कहीं ज्यादा बड़ा और आधुनिक है। फिल्म की स्टार कास्ट में वरुण धवन और दिलजीत दोसांझ जैसे सितारों को जोड़कर इसे आज की नई पीढ़ी के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच जो जबरदस्त क्रेज है, वह यह साबित करता है कि आज भी देश के वीरों की कहानियां लोगों को गहराई से छूती हैं।
फिल्म की कहानी और निर्देशन का नया अंदाज
बॉर्डर 2 की कहानी हमें वापस उसी दौर में ले जाती है जहाँ भारतीय वीरों ने अपनी जान की बाजी लगाकर देश की सीमाओं की रक्षा की थी। फिल्म का निर्देशन बेहद बारीकी से किया गया है और डायरेक्टर ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि पहली फिल्म वाला एहसास कहीं खो न जाए। फिल्म की शुरुआत बहुत ही प्रभावशाली ढंग से होती है।
मेजर कुलदीप सिंह चंदपुरी के किरदार की गरिमा को सनी देओल ने एक बार फिर बखूबी निभाया है। फिल्म के संवादों में वही पुरानी चमक देखने को मिलती है जो दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर देती है। पटकथा में इस बार युद्ध के मैदान के साथ-साथ सैनिकों के निजी जीवन और उनके परिवार के बलिदान को भी बहुत संजीदगी से दिखाया गया है।
सनी देओल का वही पुराना अवतार और नए सितारों की एंट्री
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत सनी देओल की मौजूदगी है। उनकी आंखों में आज भी वही चमक और आवाज में वही गरज सुनाई देती है जो दशकों पहले ‘बॉर्डर’ में नजर आई थी। सनी देओल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब बात एक्शन और देशभक्ति की आती है, तो उनके जैसा कोई दूसरा नहीं है।
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वरुण धवन ने एक युवा फौजी के किरदार में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है और उनके कुछ इमोशनल सीन दर्शकों की आंखें नम कर देते हैं। वहीं दिलजीत दोसांझ ने भी फिल्म में एक नई ऊर्जा भरने का काम किया है। उनकी डायलॉग डिलीवरी और सहज अभिनय फिल्म को एक अलग मजबूती प्रदान करता है।
एक्शन और तकनीकी पहलुओं की ताकत
आज के दौर की फिल्म होने के नाते बॉर्डर 2 में वीएफएक्स और आधुनिक सिनेमैटोग्राफी का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। युद्ध के दृश्यों को इतना असली फिल्माया गया है कि दर्शक खुद को उस माहौल का हिस्सा महसूस करने लगते हैं। गोलियों की तड़तड़ाहट से लेकर बमों के धमाकों तक, फिल्म का साउंड डिजाइन रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
फिल्म के संगीत की बात करें तो पुराने गानों के कुछ अंशों को नया रूप दिया गया है जो फिल्म के दौरान पुरानी यादें ताजा कर देते हैं। सिनेमैटोग्राफर ने रेगिस्तान की तपिश और रात के अंधेरे में होने वाले युद्ध को कैमरे में बहुत ही खूबसूरती के साथ कैद किया है। तकनीकी रूप से यह फिल्म बॉलीवुड की बेहतरीन वॉर फिल्मों में से एक है।
फिल्म की कुछ बारीक कमियां जो खटकती हैं
किसी भी बड़ी फिल्म की तरह बॉर्डर 2 में भी कुछ कमियां नजर आती हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है। फिल्म की लंबाई एक बड़ा मुद्दा हो सकती है क्योंकि कुछ दृश्यों को जरूरत से ज्यादा खींच दिया गया है। इसकी वजह से फिल्म की गति बीच-बीच में थोड़ी धीमी महसूस होने लगती है।
इसके अलावा कुछ जगहों पर डायलॉग्स बहुत ज्यादा लाउड लगते हैं जो शायद आज के दौर के कुछ दर्शकों को बनावटी लग सकते हैं। फिल्म के दूसरे हिस्से में कहानी थोड़ी बिखरी हुई सी लगती है, हालांकि क्लाइमेक्स तक आते-आते फिल्म फिर से अपनी पकड़ मजबूत कर लेती है। साथ ही कुछ सहायक किरदारों को उभरने का ज्यादा मौका नहीं मिल पाया है।
फिल्म देखने जाएं या नहीं क्या है अंतिम फैसला
अगर आप सनी देओल के प्रशंसक हैं और ‘बॉर्डर’ फिल्म से आपकी भावनाएं जुड़ी हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक तोहफा है। फिल्म की कुछ कमियों के बावजूद यह एक ऐसी फिल्म है जिसे हर भारतीय को थिएटर में जाकर जरूर देखना चाहिए। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी के लिए सैनिकों ने क्या कीमत चुकाई है।
फिल्म के अंत में जब देशभक्ति का जज्बा चरम पर होता है, तो थिएटर में बैठा हर व्यक्ति गर्व महसूस करता है। कुल मिलाकर बॉर्डर 2 एक पैसा वसूल फिल्म है जो आपको इमोशनल भी करती है और जोश से भी भर देती है। साल 2026 की शुरुआत के लिए इससे बेहतर और बड़ी फिल्म शायद ही कोई और हो सकती थी।
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