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UP Voter List Shock: क्या 4.5 करोड़ मतदाताओं के नाम कटे? सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब!

On: January 14, 2026 11:09 PM
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UP Voter List 2026 controversy and Supreme Court notice update
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उत्तर प्रदेश की सियासत में इस वक्त एक ऐसा तूफान खड़ा हो गया है जिसने लोकतंत्र की बुनियाद यानी ‘मतदाता सूची’ पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) द्वारा किए गए एक चौंकाने वाले दावे ने पूरे देश का ध्यान उत्तर प्रदेश की ओर खींच लिया है। दावे के मुताबिक, राज्य में चल रहे ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR 2026) के दौरान मतदाता सूची से करीब 4.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं।

इस खबर के वायरल होते ही विपक्षी दलों ने सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मामला इतना गंभीर हो गया कि अब देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर दखल दिया है। कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस भारी कटौती पर विस्तृत जवाब मांगा है। आखिर क्या है इस 4.5 करोड़ की संख्या का सच? क्या वाकई उत्तर प्रदेश में करोड़ों लोग अपने मताधिकार से वंचित हो गए हैं? आइए इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में गहराई से समझते हैं।

आम आदमी पार्टी का आरोप और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

आम आदमी पार्टी के सांसद और उत्तर प्रदेश के प्रभारी संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह सनसनीखेज आरोप लगाया था। उनका कहना है कि चुनाव आयोग के आंकड़ों और राज्य की अनुमानित जनसंख्या के बीच एक बड़ा अंतर नजर आ रहा है। उनके मुताबिक, जानबूझकर कुछ खास वर्गों और समुदायों के नाम लिस्ट से गायब किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दलील दी गई है कि मतदाता सूची से नाम हटाना किसी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार से वंचित करने जैसा है। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक भी पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर न रहे। आयोग को अब यह बताना होगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक कितने नाम काटे गए और उनके पीछे का कानूनी आधार क्या था।

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क्या है SIR 2026? क्यों हटाये जाते हैं नाम?

चुनाव आयोग हर साल मतदाता सूची का पुनरीक्षण (Revision) करता है, लेकिन 2026 में चल रहा यह ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision) ज्यादा कड़ा माना जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को ‘त्रुटिहीन’ बनाना है। सामान्यतः नाम तब हटाए जाते हैं जब कोई मतदाता स्थायी रूप से शिफ्ट हो गया हो, उसकी मृत्यु हो गई हो या फिर वह ‘डुप्लीकेट’ मतदाता (एक से ज्यादा जगह नाम होना) की श्रेणी में आता हो।

हालांकि, 4.5 करोड़ का आंकड़ा अपने आप में डराने वाला है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहाँ कुल मतदाता लगभग 15-16 करोड़ के आसपास हैं, वहां एक तिहाई नामों का गायब होना किसी बड़ी तकनीकी खामी या सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। चुनाव आयोग का प्रारंभिक बचाव यह है कि वे केवल उन नामों को हटा रहे हैं जो ‘लॉजिकल एरर’ की श्रेणी में आते हैं।

विपक्ष की लामबंदी और राजनीतिक घमासान

जैसे ही यह आंकड़ा सुर्खियों में आया, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने भी सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “लोकतंत्र की हत्या डिजिटल तरीके से की जा रही है।” विपक्ष का आरोप है कि बीएलओ (BLO) स्तर पर डेटा के साथ छेड़छाड़ की गई है और लोगों को बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के लिस्ट से बाहर किया गया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो आगामी विधानसभा चुनावों के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। उत्तर प्रदेश में कुछ सीटें ऐसी हैं जहाँ हार-जीत का अंतर कुछ हजार वोटों का होता है, ऐसे में अगर लाखों की तादाद में नाम कटते हैं, तो यह सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगा।

चुनाव आयोग का पक्ष: शुद्धिकरण या छंटनी?

इन गंभीर आरोपों के बीच भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने अपना पक्ष रखने की कोशिश की है। आयोग के सूत्रों का कहना है कि 4.5 करोड़ का आंकड़ा भ्रामक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। आयोग का दावा है कि वे केवल ‘शुद्धिकरण’ कर रहे हैं। आधार कार्ड को वोटर आईडी से लिंक करने की प्रक्रिया के बाद लाखों ऐसे नाम सामने आए जो दो-दो जगहों पर रजिस्टर्ड थे।

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आयोग ने स्पष्ट किया कि ‘विशेष गहन संशोधन’ की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और हर नाम को हटाने से पहले उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब आयोग को जिलावार डेटा पेश करना होगा, जिससे यह साफ हो जाएगा कि असल में कितने प्रतिशत नाम हटाए गए हैं।

आम जनता के बीच डर और भ्रम का माहौल

इस विवाद के बीच सबसे ज्यादा परेशान उत्तर प्रदेश का आम नागरिक है। गांवों और कस्बों में यह चर्चा आम हो गई है कि “कहीं हमारा वोट तो नहीं कट गया?” लोग बड़ी संख्या में ऑनलाइन पोर्टल और बीएलओ के पास दौड़ रहे हैं। इस भ्रम की वजह से सरकारी वेबसाइटों पर भी भारी ट्रैफिक देखा जा रहा है, जिससे कई बार सर्वर डाउन होने की शिकायतें भी मिली हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव आयोग को इस स्थिति में ज्यादा सक्रिय होकर लोगों को जागरूक करना चाहिए था। अगर किसी का नाम कटता है, तो उसे एसएमएस या ईमेल के जरिए सूचित करने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे लोकतंत्र में जनता का भरोसा बना रहे।

कैसे चेक करें अपना नाम? स्टेप-बाय-स्टेप गाइड

अगर आप भी उत्तर प्रदेश के निवासी हैं और इस विवाद के बीच अपने वोट को लेकर चिंतित हैं, तो आप घर बैठे इसे चेक कर सकते हैं। सबसे पहले चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट voters.eci.gov.in पर जाएं। वहां ‘Search in Electoral Roll’ के विकल्प पर क्लिक करें।

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आप अपने नाम, पिता के नाम, उम्र और विधानसभा क्षेत्र की जानकारी भरकर अपना नाम चेक कर सकते हैं। इसके अलावा, आप अपना एपिक (EPIC) नंबर डालकर भी स्टेटस जान सकते हैं। अगर आपका नाम लिस्ट में नहीं है, तो तुरंत फॉर्म-6 भरकर दोबारा नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करें। याद रखें, 31 जनवरी 2026 आवेदन की अंतिम तारीख है।

सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम क्या होगा?

पूरे देश की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अगर कोर्ट को लगता है कि नामों की कटौती में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो वह पूरे पुनरीक्षण (Revision) प्रक्रिया पर रोक लगा सकता है या दोबारा सर्वे के आदेश दे सकता है। यह आयोग की साख के लिए एक बड़ी परीक्षा है।

संविधान के जानकारों का कहना है कि यह मामला केवल वोटों का नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक सही मतदाता सूची का होना अनिवार्य शर्त है। अगर लिस्ट में ही गड़बड़ी होगी, तो चुनाव की निष्पक्षता पर हमेशा सवाल उठते रहेंगे।

निष्कर्ष: लोकतंत्र के लिए सतर्कता जरूरी

UP वोटर लिस्ट का यह विवाद हमें याद दिलाता है कि एक नागरिक के तौर पर हमारी सतर्कता कितनी जरूरी है। सरकार और आयोग अपनी जगह काम करते हैं, लेकिन अपने वोट की रक्षा करना हमारी भी जिम्मेदारी है। 4.5 करोड़ का आंकड़ा सच हो या झूठ, लेकिन इसने सोई हुई जनता को जगाने का काम जरूर किया है।

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आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है। चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में क्या हलफनामा पेश करता है, यह उत्तर प्रदेश की राजनीति की अगली दिशा तय करेगा। तब तक, हर मतदाता को चाहिए कि वह अपनी और अपने परिवार की वोटिंग स्थिति की जांच कर ले।

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