30 की उम्र आते-आते हर महिला के शरीर में कई प्राकृतिक बदलाव शुरू हो जाते हैं। बाहर से शरीर भले सामान्य दिखाई दे, लेकिन भीतर हार्मोन, कैल्शियम, ब्लड शुगर और थायरॉइड जैसी चीज़ें धीरे-धीरे बदलना शुरू कर देती हैं। इस उम्र में करियर, घर, बच्चों की जिम्मेदारी और मानसिक तनाव भी बढ़ता है। ऐसे में कई महिलाएँ अपनी सेहत को गंभीरता से नहीं लेतीं और बीमारी तब पकड़ में आती है जब वह काफी बढ़ चुकी होती है। इसलिए 30 की उम्र के बाद जरूरी मेडिकल टेस्ट समय पर कराना बेहद ज़रूरी हो जाता है, ताकि शरीर में चल रहे बदलावों को जल्दी पहचाना जा सके और सही समय पर बचाव किया जा सके।
सबसे पहले बात आती है शरीर के ब्लड शुगर की। आजकल भारतीय महिलाओं में डायबिटीज का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, और इसका सबसे बड़ा कारण तनाव, कम नींद, जंक फूड और कम एक्टिविटी है। अक्सर महिलाएं लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन बढ़ी हुई शुगर बिना दर्द के शरीर में कई गंभीर बदलाव लाती है। इसलिए 30 की उम्र के बाद फास्टिंग और पोस्ट-भोजन शुगर टेस्ट साल में एक बार जरूर करवाना चाहिए, ताकि समय रहते पता चल सके कि शरीर ग्लूकोज को कैसे संभाल रहा है।
इसके बाद नंबर आता है थायरॉइड का, जो महिलाओं में सबसे तेजी से असंतुलित होने वाला हार्मोन माना जाता है। 30 की उम्र के बाद थायरॉइड बढ़ना या घटना बहुत आम बात है और इसके शुरुआती लक्षण अक्सर इतने हल्के होते हैं कि महिलाएं समझ ही नहीं पातीं कि अचानक वजन क्यों बढ़ रहा है या थकान इतनी ज्यादा क्यों होने लगी है। अगर समय रहते थायरॉइड टेस्ट न कराया जाए, तो यह बाल झड़ने, पीरियड्स अनियमित होने, मूड स्विंग और गंभीर कमजोरी का कारण बन सकता है। इसलिए टीएसएच टेस्ट हर साल नियमित रूप से करवाना बेहद आवश्यक है।
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महिलाओं में आयरन की कमी भी बहुत आम है, खासकर 30 के बाद। घर और काम की दौड़-भाग, अनियमित खानपान और पीरियड्स में ब्लड लॉस की वजह से शरीर में खून की कमी हो जाती है और यह कमी धीरे-धीरे शरीर की ऊर्जा छीनने लगती है। कई महिलाएं थकान, चक्कर, कमजोरी और बाल झड़ने को सामान्य समझ लेती हैं, जबकि यह एनीमिया का संकेत होता है। इसलिए CBC और Serum Ferritin टेस्ट करवाकर यह जानना जरूरी है कि शरीर में आयरन का स्तर पर्याप्त है या नहीं।
इसके साथ ही, विटामिन D और विटामिन B12 की कमी 30 की उम्र में बहुत तेजी से बढ़ती है क्योंकि ज्यादातर महिलाएं धूप में कम निकलती हैं और पोषण भी पर्याप्त नहीं मिलता। विटामिन D की कमी हड्डियों को कमजोर बनाती है, जबकि B12 की कमी नसों, दिमाग और ऊर्जा स्तर को प्रभावित करती है। धीरे-धीरे ये कमियाँ इतनी बढ़ जाती हैं कि बॉडी में दर्द, थकान और सुन्नपन जैसी समस्याएँ लगातार रहने लगती हैं। इसलिए साल में एक बार इन दोनों टेस्ट का करवाना जरूरी है।
महिलाओं को कैल्शियम और हड्डियों की मजबूती का भी खास ध्यान रखना चाहिए। 30 की उम्र के बाद बोन डेंसिटी धीरे-धीरे कम होने लगती है और अगर शुरुआती चरण में इसका पता न चले, तो आगे चलकर ओस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। यह बीमारी चुपचाप हड्डियों को इतना कमजोर कर देती है कि छोटी सी गिरावट में भी फ्रैक्चर हो सकता है। इसलिए बोन डेंसिटी स्कैन यानी DEXA स्कैन करवाना बहुत जरूरी है, खासकर अगर परिवार में किसी को हड्डियों की बीमारी रही हो या शरीर में लगातार दर्द रहने लगे।
हार्ट हेल्थ भी इस उम्र में महत्वपूर्ण हो जाती है। तनाव, कम नींद और खुराक में तेल और शुगर की मात्रा बढ़ने से महिलाओं में भी हार्ट डिसीज का खतरा बढ़ गया है। इसलिए कोलेस्ट्रॉल प्रोफाइल और लिपिड टेस्ट करवाकर यह जानना चाहिए कि हार्ट कितनी स्वस्थ स्थिति में है। इसके साथ ही अगर कभी भी सीने में भारीपन, तेज धड़कन या असामान्य थकान महसूस हो, तो ईसीजी और अन्य जांचें भी करानी चाहिए।
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महिलाओं के लिए प्रजनन स्वास्थ्य भी बेहद जरूरी है। 30 की उम्र के बाद पीसीओएस, पीरियड्स में गड़बड़ी, हार्मोनल असंतुलन या गर्भाशय से जुड़ी समस्याएँ बढ़ने का खतरा रहता है। इसलिए गाइनैकॉलोजिस्ट से वार्षिक जांच कराना, पैप स्मीयर टेस्ट करवाना और जरूरी होने पर अल्ट्रासाउंड कराना बेहद महत्वपूर्ण होता है, ताकि किसी भी समस्या को शुरुआती स्तर पर पकड़ा जा सके।
अंत में, 30 की उम्र के बाद नियमित हेल्थ चेकअप को आदत बनाना चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ बीमारी ढूँढने के लिए नहीं होता, बल्कि शरीर को बेहतर तरीके से समझने और लंबे समय तक स्वस्थ रहने का एक तरीका है। जब महिलाएँ खुद का ध्यान रखती हैं, तभी वे परिवार और करियर के बीच सही संतुलन बना पाती हैं। इसलिए स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना कमजोरी नहीं, बल्कि मजबूत बनने का सबसे महत्वपूर्ण कदम है।





