कई बार हम सोचते हैं — “मैंने तो मन से प्रार्थना की थी, फिर मेरी बात क्यों नहीं सुनी भगवान ने?”
यह सवाल हर किसी के मन में आता है। लेकिन धर्म ग्रंथों और आध्यात्मिक शिक्षाओं में इसका बहुत गहरा उत्तर छिपा है।
भगवान हर किसी की प्रार्थना सुनते हैं, क्योंकि वह सर्वव्यापी हैं। लेकिन हर प्रार्थना का उत्तर तुरंत नहीं मिलता, क्योंकि भगवान जानते हैं कि किस समय, क्या देना सही है। जैसे एक माता-पिता अपने बच्चे को हर चीज़ उसी वक्त नहीं देते, वैसे ही भगवान भी सही समय का इंतज़ार करते हैं।
सच्ची और दिखावे वाली प्रार्थना में फर्क
अगर प्रार्थना सिर्फ ज़रूरत या डर के कारण की जाए, तो वह अधूरी मानी जाती है। लेकिन जब मन पूरी श्रद्धा, विश्वास और प्रेम से जुड़ा हो, तो वही सच्ची प्रार्थना कहलाती है। भगवान भाव के भूखे होते हैं, शब्दों के नहीं।
भगवद गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं — “जो मुझे सच्चे मन से भजता है, मैं उसके साथ सदैव रहता हूँ।”
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क्यों कुछ प्रार्थनाएँ पूरी नहीं होतीं?
कभी-कभी हमारी प्रार्थना पूरी नहीं होती, क्योंकि जो हम माँग रहे हैं, वह हमारे लिए उचित नहीं होता। भगवान वही देते हैं जो हमारे जीवन और कर्मों के अनुसार सही होता है।
कभी कभी वह हमारी परीक्षा लेते हैं ताकि हमारा मन मजबूत हो सके। याद रखिए — भगवान देर करते हैं, अंधेर नहीं।
सच्ची प्रार्थना कैसे करें?
प्रार्थना करते समय मन को शांत रखें।
अपने शब्दों से ज़्यादा भाव पर ध्यान दें।
हर दिन कुछ मिनट शांति से “धन्यवाद” बोलें।
और सबसे ज़रूरी — सिर्फ माँगें नहीं, आभार जताएँ।
जो व्यक्ति कर्म, श्रद्धा और धैर्य के साथ चलता है, उसकी हर प्रार्थना अंततः सुनी जाती है।
भगवान हर किसी की सुनते हैं, लेकिन सच्चे मन से की गई प्रार्थना ही उनके हृदय तक पहुँचती है। इसलिए सिर्फ माँगने से पहले विश्वास रखना सीखिए — क्योंकि जब समय सही होता है, तो भगवान खुद रास्ता दिखा देते हैं।
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